कोर्स 06 गतिविधि 6 : अपने विचार साझा करें

 

नौ वर्ष की आयु से लेकर अब तक आप में हुए परिवर्तनों की सूची बनाएँ। आपके द्वारा अनुभव किए गए शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक परिवर्तनों का वर्णन करें। ऐसे कौन-से परिवर्तन हैं जिनसे आपको तब तक आश्चर्य या तनाव महसूस हुआ, जब तक आपने यह महसूस नहीं किया कि ये परिवर्तन सामान्य और स्वाभाविक थे?

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  1. नौ वर्ष की आयु से लेकर अब तक

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  2. नौ वर्ष की आयु के बाद शरीर में शारीरिक परिवर्तनों को लेकर धीरे-धीरे उत्सुकता ने जन्म लिया और साथ ही भावनात्मक संज्ञान में भी परिवर्तन आने लगा। सामाजिक रुप से कभी-कभी असुरक्षा तो कभी किसी का देखना अच्छा लगने लगा समय के साथ साथ 15 16 साल की उम्र में जाकर इन सब परिवर्तनों को ना केवल तन्ने बल्कि मैंने भी अपना लिया और तब जाकर समझ में आया कि यह तो एक सामान्य प्रक्रिया थी।

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  3. सूची बनाने के दौरान महसूस किया कि यदि इन छोटी-छोटी बातों पर पहले से ध्यान दिया जाता तो 15 16 वर्ष की आयु में ऐसी कठिनाई ना होती।

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  4. किशोरावस्था मनुष्य के जीवन का बसंतकाल माना गया है। यह 12-19 वर्ष तक रहता है, परंतु किसी किसी व्यक्ति में यह बाईस वर्ष तक हो सकता है। यह काल भी सभी प्रकार की मानसिक शक्तियों के विकास का समय है। भावों के विकास के साथ साथ बालक की कल्पना का विकास होता है। उसमें सभी प्रकार के सौंदर्य की रुचि उत्पन्न होती है और बालक इसी समय नए-नए और ऊँचे आदर्शों को अपनाता है। बालक भविष्य में जो कुछ होता है, उसकी पूरी रूपरेखा उसकी किशोरावस्था में बन जाती है। जिस बालक ने धन कमाने का स्वप्न देखा, वह अपने जीवन में धन कमाने में लगता है। इसी प्रकार जिस बालक के मन में कविता और कला के प्रति लगन हो जाती है, वह इन्हीं में महानता प्राप्त करने की चेष्टा करता और इनमें सफलता प्राप्त करना ही वह जीवन की सफलता मानता है। जो बालक किशोरावस्था में समाज सुधारक और नेतागिरी के स्वप्न देखते हैं, वे आगे चलकर इन बातों में आगे बढ़ते है।

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  5. यह सच है कि किशोरावस्था से ही शारीरिक परिवर्तन होने लगते हैं वे कभी सहज तो कभी असहज बना देते हैं | अधिकतर शारीरिक परिवर्तन सहज रूप में वय के अनुसार होते गए और मैं विशेष रूप से इन परिवर्तनों को लेकर किसी अलग अनुभव से नहीं गुज़री परंतु मासिक धर्म के शुरू होने की प्रारंभिक अवस्था मैं चिता में रहती और इस सहज परिवर्तन को स्वीकार करने में मुझे थोड़ा समय भी लगा| मैं संकोची स्वभाव की बन गई थी और खेलने-कूदने में भी रूचि नहीं ले पाती थी| थोड़ा आलस्य भी स्वभाव का हिस्सा बनाने लगा था |पढाई-लिखाई में ठीक -ठाक होने के कारण आत्मविश्वास बना रहा| एक मेरी सहपाठी ने मुझ को समझाने में मदद की कि यह सब प्राकृतिक है | धीरे-धीरे स्वतः ही सब ठीक लगाने लगा|

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  6. यह ध्रुव सत्य है कि किशोरावस्था में विभिन्न तरह के शारीरिक परिवर्तन होने लगते हैं | वे परिवर्तन कभी सहज तो कभी असहज बना देते हैं | मासिकधर्म के शुरू होने की प्रारंभिक अवस्था मैं चिंतित रहती, उन दिनों असहज सी हो जाती | इस परिवर्तन को स्वीकार करने में मुझे थोड़ा समय लगा| मैं संकोची स्वभाव की हो गई थी और खेलने-कूदने में भी रूचि नहीं ले पाती थी|| पढ़ने-लिखने में होशियार होने के कारण मेरा आत्मविश्वास बना रहा| मेरी एक सहेली ने मुझे समझाया कि यह सब प्राकृतिक है , ऐसा हर किशोरी के साथ होता है | उसकी बातों का असर हुआ और धीरे-धीरे अपने आप ही सब ठीक लगाने लगा|

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  7. ह काल भी सभी प्रकार की मानसिक शक्तियों के विकास का समय है। भावों के विकास के साथ साथ बालक की कल्पना का विकास होता है। उसमें सभी प्रकार के सौंदर्य की रुचि उत्पन्न होती है और बालक इसी समय नए-नए और ऊँचे आदर्शों को अपनाता है। बालक भविष्य में जो कुछ होता है, उसकी पूरी रूपरेखा उसकी किशोरावस्था में बन जाती है। जिस बालक ने धन कमाने का स्वप्न देखा, वह अपने जीवन में धन कमाने में लगता है। इसी प्रकार जिस बालक के मन में कविता और कला के प्रति लगन हो जाती है, वह इन्हीं में महानता प्राप्त करने की चेष्टा करता और इनमें सफलता प्राप्त करना ही वह जीवन की सफलता मानता है। जो बालक किशोरावस्था में समाज सुधारक और नेतागिरी के स्वप्न देखते हैं, वे आगे चलकर इन बातों में आगे बढ़ते है।

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  8. किशोरावस्था से ही शारीरिक परिवर्तन होने लगते हैं और मैं विशेष रूप से इन परिवर्तनों को लेकर किसी अलग अनुभव से नहीं गुज़री परंतु मासिक धर्म के शुरू होने की प्रारंभिक अवस्था मैं चिता में रहती और इस सहज परिवर्तन को स्वीकार करने में मुझे थोड़ा समय भी लगा| क्योंकि उस समय विद्यालय में इस प्रकार की शिक्षा नहीं दी जाती थी न ही परिवार में माता जी इस विषय पर बात करती थी लेकिन समय के साथ -साथ इस विषय पर जानकारी प्राप्त की और धीरे -धीरे सब सामान्य लगने लगा |समय बीतने के साथ कई भावनात्मक परिवर्तन का भी सामना करना पड़ा

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  9. किशोरावस्था में विभिन्न तरह के शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन होने लगते हैं | वे परिवर्तन कभी सहज तो कभी असहज बना देते हैं | मासिकधर्म के शुरू होने की प्रारंभिक अवस्था मैं चिंतित रहती, उन दिनों असहज सी हो जाती | इस परिवर्तन को स्वीकार करने में मुझे थोड़ा समय लगा क्योंकि उस समय इस विषय पर न तो विद्यालय न ही घर पर विस्तृत जानकारी दी जाती थी |

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  10. किशोर अवस्था की जानकारी नहीं होने परेशानी होती है।

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  11. किशोर अवस्था की जानकारी नहीं होने के कारण परेशानी होती है।

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  12. किशोरावस्था में विभिन्न तरह के शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन होने लगते हैं | वे परिवर्तन कभी सहज तो कभी असहज बना देते हैं |

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  13. किशोरावस्था में शारीरिक तथा मानसिक रूप में विकास होता है अतः हमने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए।

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  14. किशोरावस्था की जानकारी होना आवश्यक

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  15. मुझे ऐसे कई अनुभव हुए जैसे मैं अन्य लड़कों की तरह लड़कियों से खुलकर बातचीत नहीं कर सकता था, मैं किसी को किसी कार्य के लिए मना नहीं कर सकता था चाहे वह कार्य मुझे पसंद न हो ।

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  16. किशोरावस्था में विभिन्न प्रकार के शारीरिक परिवर्तन होने लगते हैं।ये परिवर्तन कभी तो सहज और कभी असहज बना देते हैं।

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  17. किशोरावस्था में विभिन्न प्रकार के शारीरिक परिवर्तन होने लगते हैं यह परिवर्तन कभी तो सहज और कभी असहज बना देते हैं। को

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  18. From the childhood physical fitness is too necessary in school, it help to improve all areas

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  19. Students mentality behaviour, physical changes can see

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  20. नौ वर्ष की आयु के बाद शरीर में शारीरिक परिवर्तनों को लेकर धीरे-धीरे उत्सुकता ने जन्म लिया और साथ ही भावनात्मक संज्ञान में भी परिवर्तन आने लगा। सामाजिक रुप से कभी-कभी असुरक्षा तो कभी किसी का देखना अच्छा लगने लगा समय के साथ साथ 15 16 साल की उम्र में जाकर इन सब परिवर्तनों को ना केवल तन्ने बल्कि मैंने भी अपना लिया और तब जाकर समझ में आया कि यह तो एक सामान्य प्रक्रिया थी।

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